नई दिल्ली:
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर लिए गए एकतरफा फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। शीर्ष अदालत में दाखिल याचिका में मांग की गई है कि आयोग द्वारा अन्य चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति के बिना लिए गए ऐसे सभी फैसलों को तत्काल प्रभाव से निरस्त (रद्द) किया जाए। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने ज्ञानेश कुमार समेत संबंधित अधिकारियों पर उपयुक्त कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश देने की भी अपील की है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल हुई याचिका
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में 23 सितंबर को अंग्रेजी समाचार पत्र द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि आयोग के भीतर महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक फैसलों, विशेषकर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और नीतिगत मामलों में आम सहमति के सिद्धांतों की अनदेखी की गई।
इन्हें बनाया गया पक्षकार (प्रतिवादी)
याचिकाकर्ता ने इस मामले में केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग की सूचना प्रौद्योगिकी (IT) महानिदेशक सीमा खन्ना को पक्षकार बनाया है।
याचिका में प्रमुख मांगें:
• फैसलों को शून्य घोषित करना: चुनाव आयोग में सर्वसम्मति या बहुमत की प्रक्रिया का पालन किए बिना लिए गए निर्णयों को असंवैधानिक और गैर-कानूनी घोषित किया जाए।
• कानूनी कार्रवाई: 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट' (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम) के संबंधित प्रावधानों के तहत जवाबदेही तय करते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कानूनी कदम उठाए जाएं।
• पारदर्शिता और निष्पक्षता: संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्वतंत्र जांच समिति का गठन करने की मांग की गई है।
इस याचिका के सुप्रीम कोर्ट पहुँचने के बाद सियासी गलियारों और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई के लिए क्या रुख अपनाता है।