नई दिल्ली (बिश्नोई टाइम्स डेस्क): मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) को कानूनी कार्यवाहियों से मिली कथित छूट पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त और अहम टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों को जो कानूनी ‘सुरक्षा कवच’ दिया गया है, वह संवैधानिक अदालतों के जजों तक को हासिल नहीं है; ऐसी सुरक्षा शायद केवल देश के राष्ट्रपति के पास ही उपलब्ध है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और चुनावी नियमों को लेकर कथित मनमाने फैसलों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ के समक्ष उठा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 का हवाला देते हुए आयोग के असीमित अधिकारों पर गंभीर सवाल उठाए।
सुनवाई की प्रमुख बड़ी बातें:…
धारा 16 पर कोर्ट का रुख: कानून की धारा 16 के तहत चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों के लिए सिविल और क्रिमिनल कार्यवाहियों से पूरी सुरक्षा मिलती है, जो पद से हटने के बाद भी बरकरार रहती है।
जस्टिस बागची की तीखी टिप्पणी: सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, “यह सुरक्षा शायद सिर्फ देश के राष्ट्रपति के लिए है। यहां तक कि यह जजों पर भी लागू नहीं होता।”..
.प्रधानमंत्री के पास भी ऐसा विशेषाधिकार नहीं: याचिकाकर्ता के वकील ने इस पर दलील जोड़ते हुए कहा कि ऐसा असाधारण कानूनी कवच देश के प्रधानमंत्री के पास भी नहीं है। इसके चलते आज चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के जजों से भी ऊपर और अन्य संवैधानिक संस्थाओं से अधिक शक्तिशाली बना दिया गया है।
केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस: मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारतीय चुनाव आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
बिश्नोई टाइम्स नजरिया:…
<p>संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और उनकी जवाबदेही के बीच का संतुलन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। सुप्रीम कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी देश में चुनाव आयोग की स्वायत्तता बनाम कानून के सामने सबकी बराबरी के सवाल पर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकती है। …