सरकारी स्कूल के गेट पर बड़ा-बड़ा लिखा है—"शिक्षार्थ आइए, सेवार्थ जाइए।" पर मौजूदा हालात देखकर लगता है नीचे एक छोटा सा नोट और जोड़ देना चाहिए—"नोट: मास्साब फिलहाल वोटर पर्चियां बांटने गए हैं, बच्चे धूप सेंकें या कंचे खेलें!"
हमारे मुल्क में सरकारी शिक्षक को 'राष्ट्र निर्माता' कहा जाता है, और सिस्टम ने इस बात को इतना सीरियसली ले लिया है कि राष्ट्र निर्माण के हर ठेके में मास्टर जी को झोंक दिया गया है। देश में चुनाव हो तो बीएलओ कौन बनेगा? मास्टर जी। जनगणना की गिनती कौन करेगा? मास्टर जी। आवारा मवेशियों की गिनती, राशन कार्ड का सत्यापन, शौचालय का सर्वे या किसी सरकारी योजना का ढिंढोरा पीटना हो—प्रशासन की नजर सबसे पहले स्कूल की चौखट पर ही टिकती है।
सिस्टम का गणित बड़ा सीधा है: "अरे, स्कूल में तो सिर्फ बच्चे ही पढ़ रहे हैं ना! पढ़ाई का क्या है, वो तो अगली सदी में भी हो जाएगी, पहले वोटर लिस्ट में नाम दुरुस्त होना चाहिए।"
नतीजा यह है कि क्लासरूम में चॉक घिसने के बजाय गुरुजी गलियों में जूते घिस रहे हैं। स्कूल के कमरे वीरान पड़े हैं, पंखे हवा की जगह सन्नाटा फेंक रहे हैं और बच्चे डेस्क पर सिर रखकर सोच रहे हैं कि आज मास्टर जी किस 'राष्ट्रीय आपदा' को टालने गए हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में जोड़-घटाव और विज्ञान के फॉर्मूले होने चाहिए, उस उम्र में वे स्कूल के गेट पर खड़े होकर 'मास्साब' की वापसी की राह तक रहे हैं।
सबसे शानदार तमाशा तो बैठकों में होता है, जब बड़े-बड़े अफसर एसी कमरों में बैठकर चिंता जताते हैं—"सरकारी स्कूलों का रिजल्ट खराब क्यों आ रहा है? अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की तरफ क्यों भाग रहे हैं?" अब उन साहबों को कौन समझाए कि प्राइवेट स्कूल वाले बच्चों को पढ़ाते हैं, जबकि सरकारी मास्साब मोहल्लों में आधार कार्ड लिंक करवा रहे होते हैं!
अगर स्कूलों को सिर्फ सर्वे दफ्तर और शिक्षकों को सरकारी मुंशी ही बनाकर रखना है, तो शिक्षा बजट का ढोंग क्यों? क्लासरूम में ताला जड़िए और बाहर तख्ती लगा दीजिए—"पढ़ाई बंद है, क्योंकि देश का भविष्य बनाने वाले अभी वोटर लिस्ट बना रहे हैं!"