भारतीय राजनीति में एक अनूठा गणितीय और दार्शनिक सिद्धांत बहुत तेजी से लोकप्रिय हो चुका है: "यदि हमारा उम्मीदवार जीते, तो यह जनता का प्रचंड जनादेश और निष्पक्ष व्यवस्था का प्रमाण है; और यदि सामने वाला जीत जाए, तो समझो चुनाव आयोग 'बिका हुआ' है और चुनाव दोबारा होने चाहिए!"
हालिया चुनावी नतीजों और राजनीतिक बयानों के बाद अलग-अलग दलों की ओर से एक बार फिर 'दोबारा चुनाव' कराने की गूंज सुनाई देने लगी है। प्रेस कॉन्फ्रेंसों में माइक थामे प्रवक्ताओं के चेहरे देखकर लगता है मानो देश में लोकतंत्र की परिभाषा सिर्फ 'अपनी जीत' तक सीमित रह गई हो।
दोहरी सुविधा का 'सुविधाजनक लोकतंत्र'
सियासी गलियारों में उठ रही इस मांग पर अब जागरूक जनता और विश्लेषक चुटकी ले रहे हैं। विपक्षी खेमों की तरफ से चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते हुए कई सीटों पर पुनः मतदान की पुरजोर मांग उठाई जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा और दिलचस्प सवाल यही छूट जाता है—क्या यह मांग उन सीटों पर भी लागू होगी जहाँ भाजपा या सत्तापक्ष पूरी तरह मात खा गया?
जाहिर है, जिन राज्यों या सीटों पर विपक्ष ने झंडे गाड़े, वहाँ न तो ईवीएम पर सवाल उठे, न ही चुनाव आयोग की नीयत पर कोई संदेह व्यक्त किया गया। क्या उन सीटों पर जीतने वाले नेता यह कहेंगे कि "हुजूर, हमारी जीत में भी आयोग की कोई गड़बड़ी हो सकती है, इसलिए हमारी सीट पर भी दोबारा चुनाव करवाइए"? शायद कभी नहीं। राजनीति की यह सबसे बड़ी 'सुविधा' है कि अपनी जीत को जनता का प्यार और दूसरे की जीत को तंत्र का षड्यंत्र करार दे दिया जाता है।
संदेह के घेरे में चुनाव आयोग
उधर, चुनाव आयोग के सामने हर चुनाव के बाद वही पुरानी अग्निपरीक्षा होती है। जब तक परिणाम घोषित न हों, आयोग 'संवैधानिक संस्था' रहता है; नतीजे बदलते ही वह अचानक 'पक्षपाती' घोषित कर दिया जाता है। चुनाव आयोग पर बढ़ते राजनीतिक हमलों के बीच अब आयोग को शायद परिणामों के साथ एक 'सहानुभूति प्रमाण पत्र' भी जारी करना चाहिए, ताकि हारने वाले दल को कम से कम बहाने तलाशने की अतिरिक्त मेहनत न करनी पड़े।
चौराहे पर खड़ी आम जनता
नेताओं के इस 'दोबारा चुनाव' के खेल में सबसे ज्यादा हैरान आम मतदाता है, जो चिलचिलाती धूप और लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी उंगली पर स्याही लगवाता है। जनता अब पूछ रही है—अगर हर बार हारने के बाद इम्तिहान दोबारा ही देना है, तो फिर रिजल्ट का मतलब ही क्या रह गया?
लोकतंत्र में सवाल पूछना हक है, लेकिन सुविधा के अनुसार निष्पक्षता के पैमाने बदलना केवल चुनावी हताशा का प्रतीक बन चुका है।